
एक ही उपभोक्ता के खाते में ₹86,588 का अंतर सामने आने से बिलिंग प्रक्रिया पर उठे सवाल, कथित वसूली और विभागीय लॉगिन से संशोधन की जांच कराने की मांग
महराजगंज/निचलौल। बिजली विभाग की बिलिंग व्यवस्था से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जिसमें एक उपभोक्ता के बिजली खाते में दर्ज बकाया राशि और बाद में ऑनलाइन पोर्टल पर प्रदर्शित देय रकम के बीच भारी अंतर दिखाई देने का दावा किया गया है। मामले में उपभोक्ता प्रहलाद ने बिल संशोधन की प्रक्रिया, भुगतान से संबंधित परिस्थितियों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग उठाई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, विद्युत कनेक्शन संख्या 8177636000 पर पहले ₹88,342 की बकाया राशि प्रदर्शित हो रही थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के ऑनलाइन पोर्टल पर उसी खाते की देय राशि ₹1,754 दिखाई देने लगी। दोनों राशियों के बीच ₹86,588 का अंतर है। इतनी बड़ी राशि में बदलाव होने के कारण बिल संशोधन की प्रक्रिया और उसके आधार को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भारी बकाया राशि के आधार पर उपभोक्ता के विरुद्ध विद्युत अधिनियम की धारा 135(बी) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद करीब ₹26 हजार की राशि की रसीद काटे जाने और उपभोक्ता से अधिक रकम लिए जाने का भी आरोप लगाया गया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में संबंधित एफआईआर, भुगतान रसीद और विभागीय अभिलेखों की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, पहले प्रदर्शित ₹88,342 के बिल की नियत तिथि 13 सितंबर 2025 बताई गई थी। वहीं, बाद में पोर्टल पर दिखाई गई ₹1,754 की देय राशि की नियत तिथि 11 नवंबर 2025 बताई गई। इन दोनों प्रविष्टियों के बीच हुए बदलाव का कारण अभी स्पष्ट नहीं है। बिजली बिल में मीटर रीडिंग, उपभोग की गणना, तकनीकी त्रुटि या विभागीय सत्यापन के आधार पर संशोधन किया जा सकता है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि संबंधित खाते में इतनी बड़ी राशि का अंतर किस वजह से आया और संशोधन के लिए कौन-से दस्तावेज या अभिलेख आधार बने। शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि बिल में संशोधन विभागीय यूजर आईडी अथवा लॉगिन के माध्यम से किया गया। शिकायत में लाल बिहारी, बड़े बाबू और एक्सईएन स्तर के संबंधित अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग भी की गई है। फिलहाल, किसी व्यक्ति की संलिप्तता या अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई है। इसकी पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही हो सकती है। मामले की निष्पक्ष जांच के लिए उपभोक्ता के बिलिंग इतिहास, मीटर रीडिंग, संशोधन से पहले और बाद के बिल, भुगतान रसीदों, एफआईआर से जुड़े दस्तावेजों तथा बिल में बदलाव करने वाले लॉगिन की डिजिटल हिस्ट्री का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संशोधन किस अधिकारी की अनुमति से हुआ और क्या निर्धारित विभागीय प्रक्रिया का पालन किया गया। उपभोक्ता के खाते में पहले दर्ज ₹88,342 और बाद में प्रदर्शित ₹1,754 की राशि के बीच अंतर का संतोषजनक स्पष्टीकरण सामने आना जरूरी है। यदि शुरुआती बिल में त्रुटि थी, तो उसके कारणों और सुधार की प्रक्रिया की जानकारी दी जानी चाहिए। वहीं, यदि किसी स्तर पर नियमों के विपरीत कार्रवाई हुई है, तो जांच के आधार पर जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए।
फिलहाल, मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और विभागीय पक्ष सामने आना बाकी है। अब देखना होगा कि संबंधित बिजली विभाग इस अंतर पर क्या स्पष्टीकरण देता है और जांच के बाद उपभोक्ता को पूरे मामले की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल पाती है या नहीं।




